Wednesday, 28 June 2017

उनकी गली में जाता हूँ तो क़दम मेरे रुक जाते हैं

उनकी गली में जाता हूँ तो क़दम मेरे रुक जाते हैं
देख के वो हँसते हैं मुझको पर्दे में छुप जाते हैं
उनका मुस्काना फूलों को इतना अच्छा लगता है 

उनकी एक मुस्कान पे गुल हँसते-हँसते थक जाते हैं
वो गर काँटे भी दें तो फूल से नाज़ुक लगते हैं
वर्ना ये भी होता है मुझे फूल चुभ जाते हैं
ख़ुशबू तितली चाँद सितारे उनके संग-संग चलते हैं
रुक जाएँ तो लहरेँ साँसे दरिया भी रुक जाते हैं
उनकी बोली उनकी बातें उनकी पायल की छम-छम
बागों मेँ गाते पंछी जब सुनते हैं चुप जाते हैं
उनके एक इशारे पर सब मिलकर मुझे सताते हैं
देख के हाथोँ में ख़त पंछी दूरी से ही उड़ जाते हैं
मैँ उनकी आँखों का दिवाना बन बैठा तो हैरत क्या
नज़र उठा लेते हैं वो जब तारे भी गिर जाते हैं
उनकी ज़ुल्फें बादल हैं या काली-काली राते हैं
जिनके साये में आकर हम सूरज से बच जाते हैं
- सिराज फ़ैसल ख़ान

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