Wednesday, 28 June 2017

क्या जिरह ,क्या फैसले,जुर्म का इकबाल है

क्या जिरह ,क्या फैसले,जुर्म का इकबाल है
असल कातिल फिर बरी है,ये अजब सवाल है
वक़्त का क्या हिसाब दें ,फर्क पैमानों का है 

तुम लम्हों की फिराक में,यहाँ ज़िन्दगी का सवाल है
एक मेरी दिल्लगी,इक संगदिली तेरी सनम
बारिशें कब जानतीं, सूखी नदी का हाल है
ये तलब तेरी मुझे,जाने कहाँ से लग गयी
रात दिन तेरा नशा है,बस तेरा ही ख्याल है
फूल पत्थर पर खिलाने की, हमें जिद है तो है
अब बहारें हों,खिज़ां हो,कौन करता मलाल है
- आरती श्रीवास्तव

No comments:

Post a Comment