Wednesday, 28 June 2017

लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं

लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ, न कोई तारा हूँ

रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं
- राहत इंदौरी

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