Wednesday, 28 June 2017

सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता

सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता
सफ़र में तुम नहीं हो तो सफ़र अच्छा नहीं लगता
फिजा में रंग होली के हों या मंज़र दीवाली के
मगर जब तुम नहीं होते ये घर अच्छा नहीं लगता

जहाँ बचपन की यादें हों कभी माँ से बिछड़ने की
भले ही ख़ूबसूरत हो शहर अच्छा नहीं लगता
परिन्दे जिसकी शाखों पर कभी नग्में नहीं गाते
हरापन चाहे जितना हो शज़र अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे हुस्न का ये रंग सादा ख़ूबसूरत है
हिना के रंग पर कोई कलर अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे हर हुनर के हो गए हम इस तरह कायल
हमें अपना भी अब कोई हुनर अच्छा नहीं लगता
निगाहें मुंतज़िर मेरी सभी रस्तों की है लेकिन
जिधर से तुम नहीं आते उधर अच्छा नहीं लगता
- जयकृष्ण तुषार

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