Saturday, 1 July 2017

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी- बशीर बद्र

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी

छप्पर के चायख़ाने भी अब ऊंघने लगे
पैदल चलो के कोई सवारी न आएगी

तहरीरों गुफ़्तगू में किसे ढूँढ़ते हैं लोग
तस्वीर में भी शक्ल हमारी न आएगी

सर पर ज़मीन लेके हवाओं के साथ जा
आहिस्ता चलने वाले की बारी न आएगी

पहचान हमने अपनी मिटाई है इस तरह
बच्चों में कोई बात हमारी न आएगी


- बशीर बद्र

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