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Saturday, 1 July 2017

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो- बशीर बद्र

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा- बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा


बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी- बशीर बद्र

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी
अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी

छप्पर के चायख़ाने भी अब ऊंघने लगे

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला- बशीर बद्र

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला


घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा-बशीर बद्र

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,

ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे- बशीर बद्र

ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ज़िन्दगी तेरे आस पास रहे

चाँद इन बदलियों से निकलेगा

कोई न जान सका वो कहाँ से आया था- बशीर बद्र

कोई न जान सका वो कहाँ से आया था
और उसने धूप से बादल को क्यों मिलाया था

यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नही

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में- बशीर बद्र

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा- बशीर बद्र

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा

आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह- बशीर बद्र

आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह

जब कभी बादलों में घिरता है

ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में- बशीर बद्र

ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में

तुम छत पे नहीं आए, मैं घर से नहीं निकला

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया- बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के

कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है- बशीर बद्र

कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर

नाम उसी का नाम सवेरे शाम लिखा- बशीर बद्र

नाम उसी का नाम सवेरे शाम लिखा
शे’र लिखा या ख़त उसको गुमनाम लिखा

उस दिन पहला फूल लिखा जब पतझड़ ने

किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना- बशीर बद्र

किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना
मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना

सियासत की अपनी अलग इक ज़बाँ है

सात रंगों के शामियाने हैं- बशीर बद्र

सात रंगों के शामियाने हैं
दिल के मौसम बड़े सुहाने हैं

कोई तदबीर भूलने की नहीं

इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ- बशीर बद्र

इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
मेरा उसूल है, पहले सलाम करता हूँ

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है

याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम- बशीर बद्र

याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम
कुछ दिनों तक ख़ुदा रहे हैं हम

आरज़ूओं के सुर्ख़ फूलों से

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता- बशीर बद्र

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता


बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना

न जी भर के देखा न कुछ बात की- बशीर बद्र

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं