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Saturday, 1 July 2017

न जी भर के देखा न कुछ बात की- बशीर बद्र

न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है

यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे

दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ

दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ
घर के बाहर घर जैसा आराम कहाँ

बाज़ारों की चहल-पहल से रोशन है

होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते

होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते

पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है
बावज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है

मैं तिरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ

सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों

सूरज चंदा जैसी जोड़ी हम दोनों
दिन का राजा रात की रानी हम दोनों

जगमग जगमग दुनिया का मेला झूठा

वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों

वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियाँ न हों

पलकों से आँसुओं की महक आनी चाहिए

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया

आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी

रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं

रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं
हंसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़्मी हो जाते हैं

इस्टेसन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ

कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है

यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिये

आप दरिया हैं तो फिर इस वक्त हम खतरे में हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है

बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है

बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है

बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जाँ से हम निकल जाएँ

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है

धुआँ बादल नहीं होता कि बादल दौड़ पड़ता है

भरोसा मत करो साँसों की डोरी टूट जाती है

भरोसा मत करो साँसों की डोरी टूट जाती है
छतें महफ़ूज़ रहती हैं हवेली टूट जाती है

मुहब्बत भी अजब शय है वो जब परदेस में रोये

मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना

मुझको हर हाल में बख़्शेगा उजाला अपना
चाँद रिश्ते में तो लगता नहीं मामा अपना

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू

तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है

तू हर परिन्दे को छत पर उतार लेता है
ये शौक़ वो है जो ज़ेवर उतार लेता है

मैम आसमाँ की बुलन्दी पे बारहा पहुँचा

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

तुमसे नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती
आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती

इतना मोहताज न कर चश्म-ए-बसीरत मुझको